'पीपली लाइव'

'पीपली लाइव' फ़िल्म को देखकर लगता है कि यह पत्रकारिता पर चोट करती है,
फिर लगता है कि शायद अफ़सरशाही इसके निशाने पर है या फिर राजनीति.

सच कहें तो यह फ़िल्म पूरी व्यवस्था के मुंह पर तमाचा है.

ऐसी व्यवस्था जिसके पास मरे हुए किसान के लिए तो योजना है लेकिन उसके लिए
नहीं जो जीना चाहता है.

ये उन पत्रकारों पर तमाचा है जो लाइव आत्महत्या में रुचि रखते हैं
तिल-तिल कर हर रोज़ मरने वाले में नहीं.

फ़िल्म न तो नत्था किसान के बारे में है और न ही किसानों की आत्महत्या के
बारे में. ये कहानी है उस भारत की जहां इंडिया की चमक फीकी ही नहीं पड़ी
है बल्कि ख़त्म हो गई है.

उस भारत की जो पहले खेतों में हल जोतकर इंडिया का पेट भरता था और अब
शहरों में कुदाल चलाकर उसी इंडिया के लिए आलीशान अट्टालिकाएं बना रहा है.

जहां तक नत्था के मरने का सवाल है जिसे केंद्र में रख कर आमिर ख़ान ने
पूरा प्रचार अभियान चलाया है...उसके बारे में इतना ही कहूंगा कि नत्था
मरता नहीं है उसके अंदर का किसान ज़रुर मरता है जो आज हर भारतीय किसान के
घर की कहानी है.

अनुषा बधाई की पात्र हैं जो उन्होंने ऐसे मुद्दे पर फ़िल्म बनाई.
अंग्रेज़ी में जिसे ब्लैक ह्यूमर कहते हैं...उसकी भरमार है और यही इसकी
थोड़ी कमज़ोर स्क्रिप्ट का अहसास नहीं होने देती.

यह फ़िल्म एक बार फिर इस बात का अहसास दिलाती है कि हम कैसे भारत में रह
रहे हैं. वो भारत जो न तो हमारे टीवी चैनलों पर दिखता है और न ही हमारे
नेताओं की योजनाओं में.

अगर जाने माने फ़िल्म समीक्षक अजय ब्रहात्मज के शब्द उधार लूं तो फि़ल्म
शानदार है जो रोंगटे खड़े कर देती है.

मुद्दा ग़रीबी नहीं है...मुद्दा जीने का है..चाहे वो मिट्टी खोदकर हो या
मर कर. क्या फ़र्क पड़ता है गांव की मिट्टी खोद कर मरें या कॉमनवेल्थ
गेम्स के लिए मिट्टी खोदते हुए.

फ़िल्म को अंतरराष्ट्रीय सर्किट में पसंद किया जा रहा है और किया जाएगा.
हो सकता है लोग कहें कि इसमें भारत की ग़रीबी को ही दिखाया गया (जैसा कि
स्लमडॉग मिलियनेयर के बारे में कहा गया था) मैं तो यही कहूंगा कि यही
सच्चाई है..

पत्रकार, अफ़सर और राजनेता ये फ़िल्म ज़रुर देखें और अपनी कवरेज योजना और
व्यवहार में थोड़ी सी जगह इस असली भारत को दें तो अच्छा होगा.